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अकमल खान
रायबरेली (राष्ट्र पटल)। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सोमवार की देर रात एक दिवसीय दौरे पर अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली पहुंचे। मंगलवार को उन्होंने जनसुनवाई की, कई कार्यक्रमों में भाग लिया और कार्यकर्ताओं से संवाद किया, लेकिन पूरे दौरे की सबसे अहम बात यह रही कि राहुल गांधी ने मीडिया से लगभग पूरी तरह दूरी बनाए रखी। नतीजा—दौरा हुआ, गतिविधियां हुईं, लेकिन खबरों में वह उछाल नहीं दिखा, जो आमतौर पर उनके रायबरेली आगमन पर देखने को मिलता है।

दिनभर मीडिया कर्मी राहुल गांधी की एक ठोस बाइट के लिए जद्दोजहद करते रहे। कई आग्रहों के बाद आखिरकार गाड़ी में बैठे-बैठे उन्होंने संक्षिप्त प्रतिक्रिया दी, जिसे औपचारिकता भर माना गया। इससे पहले उन्होंने क्रिकेट प्रतियोगिता का शुभारंभ किया, नगर पालिका अध्यक्ष के घर पहुंचकर नवदंपती को आशीर्वाद दिया, विकास कार्यों का लोकार्पण किया और ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ कार्यक्रम में भी शामिल हुए। लेकिन इन तमाम आयोजनों के बावजूद मीडिया को ऐसा कोई बयान या संवाद नहीं मिला, जिससे राष्ट्रीय या प्रादेशिक स्तर पर बहस खड़ी हो सके।

यही वजह रही कि राहुल गांधी का यह दौरा खबरों में तो रहा, लेकिन सुर्खियों पर छाने से चूक गया। जबकि इससे पहले उनके हर रायबरेली दौरे पर सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक खासा शोर देखने को मिलता था। पिछले दौरे में तो भाजपा कार्यकर्ताओं के विरोध और हंगामे ने राहुल गांधी को अतिरिक्त मीडिया स्पेस दिलाया था। लौटने के बाद भी वे कई दिनों तक चर्चा के केंद्र में बने रहे थे।

इस बार तस्वीर बिल्कुल उलट रही। राहुल गांधी करीब 18 घंटे रायबरेली में रहे, लेकिन न कोई विरोध हुआ, न नारेबाजी, न पोस्टरबाजी और न ही भाजपा की किसी घटक इकाई की सक्रियता नजर आई। सत्ता पक्ष की यह चुप्पी इतनी संगठित और सुनियोजित दिखी कि राजनीतिक गलियारों में इसे एक स्पष्ट रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने इस बार ‘प्रतिक्रिया न देने’ की रणनीति अपनाई। विरोध न कर के, बयान न देकर और सड़क पर न उतर कर भाजपा ने राहुल गांधी के दौरे से जुड़ी संभावित सुर्खियों की हवा ही निकाल दी। नतीजतन, ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ जैसी मुहिम भी राष्ट्रीय मीडिया में अपेक्षित जगह नहीं बना सकी।

कयास लगाए जा रहे हैं कि पिछले दौरों से सबक लेते हुए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने पहले से ही अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाम कस दी थी। उद्देश्य साफ था—विपक्ष को वह मंच न देना, जिससे वह सहानुभूति, टकराव या संघर्ष के जरिए मीडिया का ध्यान खींच सके।

कुल मिलाकर, इस बार राहुल गांधी रायबरेली आए, अपने कार्यक्रम पूरे किए और चुपचाप लौट भी गए। लेकिन राजनीतिक तौर पर यह दौरा इसलिए ज्यादा अहम माना जा रहा है, क्योंकि यहां चर्चा राहुल गांधी की गतिविधियों से ज्यादा भाजपा की ‘खामोश रणनीति’ की हो रही है। यही वजह है कि इस बार सुर्खियों में राहुल कम और भाजपा की राजनीतिक समझदारी ज्यादा दिखाई दे रही है।

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