अकमल खान
रायबरेली (राष्ट्र पटल)। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के एक दिवसीय रायबरेली दौरे के दौरान उनके दादा फिरोज गांधी के कथित ड्राइविंग लाइसेंस को लेकर उठे शोर पर राज्य मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने तीखा प्रहार करते हुए पूरे प्रकरण की “हवा निकाल” दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने इसे फर्जी दावा और सोची-समझी इवेंटबाज़ी करार दिया और कहा कि मीडिया में चर्चा बनाए रखने के लिए ऐसी स्क्रिप्ट रची जाती है, लेकिन उनके रहते आम जनता को गुमराह नहीं किया जा सकता।

राज्यमंत्री ने कहा कि राहुल गांधी सिर्फ नेता प्रतिपक्ष नहीं, बल्कि रायबरेली के सांसद भी हैं। उन्हें यहां के विकास और जनहित के मुद्दों पर बात करनी चाहिए। लेकिन हर दौरे में कांग्रेस की ओर से जनता को भ्रमित करने की कोशिश होती है—कभी सरकारी योजनाओं से बेवजह अडानी-अंबानी का नाम जोड़कर तो कभी भावनात्मक शगूफे छोड़कर।

दशकों पुराने ड्राइविंग लाइसेंस के दावे पर सवाल उठाते हुए दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि इतना अहम दस्तावेज़ अगर वास्तविक होता, तो वर्षों तक किसी थर्ड पर्सन के पास कैसे रहता? आमतौर पर ऐसे कागज़ात लोग खुद संभालकर रखते हैं, और अगर कहीं मिल भी जाएं तो संबंधित व्यक्ति तक लौटा दिए जाते हैं। वर्षों बाद अचानक लाइसेंस दिखाकर गांधी परिवार को रायबरेली की ज़मीन से जोड़ने की कोशिश सिर्फ एक इवेंट है—इसमें कोई सच्चाई नहीं। उन्होंने इस पूरे मामले की सरकारी जांच की बात भी कही।
गौरतलब है कि बीते मंगलवार को राहुल गांधी रायबरेली आए थे। एक कार्यक्रम में एक युवक ने कथित तौर पर ड्राइविंग लाइसेंस की मूल प्रति सौंपते हुए दावा किया कि वह फिरोज गांधी का है। इस दावे को नेशनल मीडिया ने भी कवरेज दी, जबकि स्थानीय स्तर पर दिनभर चर्चाओं का बाजार गर्म रहा। आम लोगों के बीच सवाल उठते रहे—उस दौर में, जब देश में वाहन गिने-चुने थे, पक्की सड़कें अपवाद थीं, तब किसी तीसरे व्यक्ति के पास पचासों साल तक लाइसेंस सुरक्षित रहना कैसे संभव है?

जानकारी के मुताबिक फिरोज गांधी का जन्म 1912 में महाराष्ट्र में हुआ और 1960 में उनका निधन हुआ। जीवन के अंतिम करीब दस वर्षों तक वे रायबरेली के सांसद रहे। 65 साल बाद उनके ड्राइविंग लाइसेंस को लेकर किया गया दावा अब विवाद और सियासी बहस का कारण बन गया है। राज्यमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद मीडिया स्पेस में बड़े नेताओं के क्रियाकलापों को लेकर नई बहस छिड़ गई है।

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