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अरविंद चित्तौड़िया
भारत में सम्मान दिए जाते हैं या बाँटे जाते हैं? यह प्रश्न आज खेल जगत और राष्ट्रभक्तों के गलियारों में गूँज रहा है। जिस परिवार ने भारतीय हॉकी को अपने खून-पसीने से सींचा, जिसने ओलंपिक, विश्व कप और एशियाई खेलों में देश की झोली में 13 पदक डाले, वह सूबेदार सोमेश्वर दत्त सिंह का परिवार आज भी अपने उचित हक—भारत रत्न और पद्म पुरस्कारों—से वंचित क्यों है?
उपलब्धियों का अंबार, सम्मान का अकाल
मेजर ध्यानचंद, कैप्टन रूप सिंह, अशोक कुमार और नेहा सिंह; ये महज नाम नहीं, बल्कि भारतीय हॉकी के स्वर्णिम अध्याय हैं।
* मेजर ध्यानचंद: जिन्हें दुनिया ‘हॉकी का जादूगर’ मानती है, जिन्होंने हिटलर के प्रस्ताव को देशप्रेम के आगे ठुकरा दिया, वे आज भी ‘भारत रत्न’ की प्रतीक्षा में हैं।
* कैप्टन रूप सिंह: दो ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाले इस दिग्गज के नाम पर जर्मनी ने सड़क का नाम रखा और लंदन ओलंपिक में मेट्रो स्टेशन का नाम समर्पित किया, लेकिन अपने ही देश में उन्हें पद्म सम्मान के योग्य नहीं समझा गया।
* अशोक कुमार: 1975 विश्व कप के फाइनल में विजयी गोल दागकर भारत को विश्व विजेता बनाने वाले नायक को आज 50 वर्ष बीत जाने के बाद भी पद्म पुरस्कार का इंतजार है।
विचारधारा बनाम योग्यता: एक कड़वा सच
यह विडंबना ही है कि जो टीम विश्व कप में 12वें स्थान पर रही, उसके सदस्यों को पद्म पुरस्कारों से नवाजा गया, लेकिन स्वर्ण पदक दिलाने वाले अशोक कुमार जैसे खिलाड़ी की उपेक्षा की गई।
प्रश्न यह उठता है कि क्या सम्मान देने का मापदंड अब योग्यता और नैतिकता के बजाय ‘राजनीतिक विचारधारा’ और ‘वोट बैंक’ बन गया है?
 “शायद इन खिलाड़ियों का अपराध यही था कि वे किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से नहीं जुड़े और न ही सत्ता के गलियारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वे केवल तिरंगे के लिए निष्काम भाव से खेलते रहे।”

विज्ञापनों और सत्ता के समीकरणों का बोलबाला
आज का दौर डिजिटल प्रचार और ब्रांडिंग का है। जहाँ पान-मसाला और शराब (सोडा के आड़ में) का विज्ञापन करने वाले कलाकार पद्म सम्मान से अलंकृत हो रहे हैं।
वहीं देश का मान बढ़ाने वाले वास्तविक नायक नेपथ्य में धकेल दिए गए हैं। जब पुरस्कारों का चयन ‘योगदान’ के बजाय ‘भविष्य के राजनीतिक गठबंधन’ और ‘चुनावी लाभ’ को देखकर होने लगे, तो यह लोकतंत्र और खेल भावना दोनों के लिए चिंता का विषय है।
जनमानस के रत्न सरकार
की फाइलें भले ही धूल फांक रही हों और प्रधानमंत्रियों की कलम की स्याही सूख गई हो, लेकिन भारत के जनमानस के दिलों में मेजर ध्यानचंद और उनका परिवार ‘भारत रत्न’ से कहीं ऊंचा स्थान रखता है। यह लेख केवल एक शिकायत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था को आईना दिखाने का प्रयास है। जो राष्ट्र के असली नायकों को भूलकर ‘तुष्टिकरण’ और ‘विचारधारा’ के आधार पर सम्मानों की बंदरबांट कर रही है।
क्या 1975 की विश्व विजय की स्वर्ण जयंती पर सरकार अशोक कुमार को सम्मानित कर अपनी भूल सुधारेगी? या फिर ये महान खिलाड़ी इतिहास के पन्नों में केवल एक ‘उपेक्षित नायक’ बनकर रह जाएंगे?

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