​सांसद खेल स्पर्धा तो हुई, पर ‘ओलंपिक’ का इंतजार बरकरार

अरविन्द चित्तौड़िया
​मथुरा (राष्ट्र पटल)। कान्हा की नगरी, जो कुश्ती से लेकर एथलेटिक्स तक में देश को दिग्गज खिलाड़ी दे चुकी है, वहां आज प्रतिभाएं सिस्टम की सुस्ती और आयोजनों के अभाव में अपनी चमक खो रही हैं। मथुरा के सैंकड़ों खिलाड़ी इस सवाल के साथ टकटकी लगाए बैठे हैं कि आखिर ‘जिला ओलंपिक खेलों’ का आयोजन कब होगा?
​हाल ही में मथुरा में सांसद खेल स्पर्धा 2025-26 का भव्य शुभारंभ हुआ, जिसमें पांचों विधानसभाओं के खिलाड़ियों ने अपना दम दिखाया। हालांकि, खिलाड़ियों का मानना है कि ‘जिला ओलंपिक’ जैसे बड़े मंच की कमी अभी भी खल रही है। जिला ओलंपिक खेलों के माध्यम से न केवल नई प्रतिभाएं उभरती हैं, बल्कि खिलाड़ियों को राज्य और राष्ट्रीय स्तर के लिए आधिकारिक रैंकिंग और अनुभव भी मिलता है।

​खिलाड़ियों की पीड़ा: अभ्यास भरपूर, अवसर कम
​मथुरा के गणेशरा स्टेडियम और अन्य खेल मैदानों पर पसीना बहा रहे युवाओं का कहना है कि वे सालों-साल मेहनत करते हैं, लेकिन जिला स्तर पर नियमित ओलंपिक प्रतियोगिताओं के न होने से उन्हें अपनी क्षमता परखने का सही मंच नहीं मिल पाता।
​उम्र की सीमा: कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी केवल इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि आयोजनों में देरी की वजह से वे अपनी आयु वर्ग से बाहर होते जा रहे हैं।
​आर्थिक बोझ: सरकारी आयोजनों के अभाव में खिलाड़ियों को निजी टूर्नामेंट्स में भारी फीस देकर हिस्सा लेना पड़ता है, जो हर किसी के बस की बात नहीं।

​सुविधाएं हैं, पर तालमेल की कमी?
​मथुरा में खेल संसाधनों की कमी नहीं है, लेकिन खेल संघों और प्रशासन के बीच तालमेल की कमी के कारण कैलेंडर के अनुसार प्रतियोगिताओं का आयोजन नहीं हो पा रहा है। एथलेटिक्स, कुश्ती, जूडो और बॉक्सिंग जैसे खेलों में मथुरा का दबदबा रहा है, लेकिन आधिकारिक जिला ओलंपिक के बिना इन खिलाड़ियों का भविष्य अधर में लटका है।

क्या कहते हैं जिम्मेदार?
​खेल विभाग और जिला खेल संघों की ओर से अक्सर फंड और आधिकारिक निर्देशों का हवाला दिया जाता है। हालांकि, खिलाड़ियों और खेल प्रेमियों की मांग है कि जिला ओलिंपिक ओलंपिक संघ को जल्द से जल्द मथुरा के लिए विशेष खेल कैलेंडर जारी करना चाहिए।

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