
अकमल खान
रायबरेली (राष्ट्र पटल)। आज से मुकद्दस रमजान का आग़ाज़ हो गया है। चारों तरफ़ रहमत, मस्जिदों की रौनक़ और दिलों में नूर की चमक दिखाई दे रही है। यह वह मुबारक महीना है जिसे रहमत, बरकत और मग़फ़िरत का महीना कहा जाता है। मान्यता है कि इस महीने में रहमत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, बख्शिश के रास्ते आसान कर दिए जाते हैं और बंदों को अपने रब से क़रीब होने का बेहतरीन मौका मिलता है।
रमजान सिर्फ़ रोज़ा रखने का नाम नहीं, बल्कि अपने किरदार को संवारने, बुराइयों से तौबा करने और नेकी की राह पर चलने का पैग़ाम है। यह महीना सब्र, शुकर और इंसानियत की तालीम देता है। भूख और प्यास सहकर इंसान ग़रीबों और ज़रूरतमंदों का दर्द महसूस करता है, जिससे दिलों में हमदर्दी और मोहब्बत पैदा होती है।
उलेमा का कहना है कि रमजान में की गई हर नेकी का सवाब कई गुना बढ़ा दिया जाता है। इसलिए नमाज़, रोज़ा, तरावीह, तिलावत-ए-कुरआन और ज़कात-ओ-खैरात का खास एहतिमाम करना चाहिए। यह महीना अपने गुनाहों से तौबा कर नई और पाक ज़िंदगी की शुरुआत करने का सुनहरा अवसर है।
माह-ए-रमजान हमें तौहीद और रिसालत के पैग़ाम पर मज़बूती से कायम रहने की सीख देता है। साथ ही यह भी याद दिलाता है कि असली कामयाबी दुनियावी दिखावे में नहीं, बल्कि अल्लाह की रज़ा हासिल करने में है।
इस पाक महीने में हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को साफ़ करें, रिश्तों को मज़बूत करें, नफरतों को खत्म करें और समाज में भाईचारा व अमन का पैग़ाम फैलाएं। यही रमजान का असली मक़सद है और यही हमारी कामयाबी है।






