राष्ट्र पटल संवाद

इटावा। मजलिस बराये उमूरे शरई,इटावा गत वर्षों से विभिन्न अवसरों पर इबादात (नमाज, रोजा, जकात, हज, कुर्बानी) से संबंधित तमाम मुस्लिम समाज की आसानी के लिए एडवाइजरी जारी करता रहा है।

चूंकि आगामी 28, 29 व 30 मई (9, 10 व 11 ज़िलहिज्जा) को हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी परम्परागत रूप से ईद-उल-अजहा (बकरईद) मनायी जायेगी। इस मौके की सबसे अहम इबादत कुर्बानी है। मुसलमानों के लिए कुरआन व हदीस की रोशनी में मजलिस बराये उमूरे शरई, इटावा के अध्यक्ष मौलाना तारिक़ शम्सी ने निम्न एडवाइजरी जारी की है उम्मीद है कि मुस्लिम समाज इसका ख्याल रखेगा और एक अच्छा शहरी और आदर्श मुसलमान होने का सुबूत देगा।

(1) कुर्बानी हजरत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सुन्नत और अल्लाह का हुकुम है यह कोई गोश्त खाने या खिलाने की रस्म (परम्परा) नहीं है बल्कि इस अहम हुक्म पर हजरत मुहम्मद साहब ने खुद भी अमल किया है और अपनी उम्मत को भी इस पर अमल करने का हुक्म दिया है।

(2) कुर्बानी के दिनों में अल्लाह को कुर्बानी से बढ़कर कोई और अमल पसन्द नहीं, इसलिए मुस्लिम समाज को ईद-उल-अजहा (बकरईद) के अवसर पर जहाँ तक मुमकिन हो कुर्बानी करने की कोशिश करनी चाहिए। गरीब और कमज़ोर लोगों की भी कुर्बानी के गोश्त से मदद करें और अपनी खुशी में उन्हें शरीक करें।

(3) ईद-उल-अजहा (बकरईद) के मौके पर जिन जानवरों की परम्परागत रूप से की जाती है सिर्फ उन्हीं जानवरों की कुर्बानी की जायेगी। कुर्बानी के जानवर की फोटो और वीडियो हरगिज/किसी भी दशा में सोशल मीडिया पर न डालें।

(4) कुर्बानी का बदला सदका खैरात और गरीबों की मदद या कोई दूसरा नेक काम नहीं हो सकता, जो लोग शरीयत के कानून के मुताबिक साहिबे हैसियत हैं उन्हें कुर्बानी ज़रूर करना चाहिये। कुर्बानी का बदला कोई दूसरी इबादत नहीं है।

(5) जिन लोगों पर कुर्बानी वाजिब हो वो ख्वाहिश और कोशिश के बावुजूद अपनी जगह पर कुर्बानी न कर सकें तो वो दूसरी जगह पर अपनी कुर्बानी अदा करायें और उसकी कोशिश भी करें। अगर यह भी मुमकिन नहीं तो कुर्बानी के दिन गुजरने के बाद कुर्बानी की रकम के बराबर रकम गरीबों में सदका कर दें।

(6) मुस्लिम समाज कोई ऐसा काम न करे जिससे पूरे मुस्लिम समाज को शर्मिंदगी उठानी पड़े।

(7) कुर्बानी सड़कों पर और खुले में न करें, प्रतिबंधित जगहों में न करें, प्रतिबंधित जानवर की कुर्बानी न करें जिससे किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचे और शान्ति भंग हो, जिससे आपसी सौहार्द बिगड़े।

(8) अपने गली और मुहल्लों में सफाई सुथराई का खास ख्याल रखें। कुर्बानी का कचरा नगर पालिका की मदद से साफ़ करा दें।

(9) नमाज ईद-उल-अज़हा वाजिब है जिसमें एक रास्ते से जाना और दूसरे रास्ते से आना सुन्नत है।

(10) सभी फर्ज नमाज़ों के बाद चाँद की 9 तारीख से 13 तारीख़ तक तकबीर तशरीक पढ़ना वाजिब है, सभी लोग इसका एहतिमाम करें। मर्द और औरतें दोनों को पढ़ना ज़रूरी है।

(11) ईद-उल-अजहा (बकरईद) के दिन डी.जे बजाना, गाने बजाना, रास्ता रोकना और किसी पड़ोसी को तकलीफ देना वगैरा सख्त गुनाह के काम हैं, इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता।

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