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राष्ट्र पटल संवाद

जसवंतनगर (इटावा)। कुनैरा से विहार करते हुए समाधिस्थ आचार्य श्री विराग सागर महाराज के शिष्य एवं प्रवचन केसरी मुनि श्री 108 विश्रांत सागर महाराज का नगर में मंगल प्रवेश हुआ। श्री पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर पहुंचने पर सकल दिगंबर जैन समाज के श्रद्धालुओं, युवाओं और गुरु भक्तों ने उनका भव्य स्वागत किया।

मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। भक्तों ने आरती, पाद प्रक्षालन और जयघोष के साथ मुनि श्री का मंगल प्रवेश कराया। पूरा वातावरण धर्ममय और भक्तिमय बना रहा। प्रवचन के दौरान मुनि श्री विश्रांत सागर महाराज ने कहा कि प्रत्येक जीव में ज्ञान विद्यमान है, आवश्यकता केवल उसके सही दिशा और सही स्थान पर उपयोग की है। मनुष्य यदि अपने ज्ञान का सदुपयोग करे तो वह इस भव से मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे दूध से घी प्राप्त करने के लिए सही प्रक्रिया का ज्ञान जरूरी है, उसी प्रकार जीवन में सही मार्ग और सही दिशा में कार्य करने से ही आत्मकल्याण संभव है। उन्होंने कहा कि यदि हम जिनवाणी माता की शरण में जाएं तो अपनी आत्मा को परमात्मा बना सकते हैं।

मुनि श्री ने कहा कि एक पत्थर मंदिर में मूर्ति बनकर पूजनीय हो जाता है और दूसरा फर्श में लग जाता है, अंतर केवल आकार और उपयोग का होता है। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन को सही आकार देने की आवश्यकता है। प्रवचन के दौरान श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के उपदेशों को श्रद्धा भाव से सुना और धर्म लाभ प्राप्त किया।

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