केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नक्सलवाद के लगभग पूरी तरह खत्म होने का दावा काफी हद तक सही है, क्योंकि हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों ने नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक जीत हासिल की है। सरकार द्वारा निर्धारित 31 मार्च, 2026 की समय-सीमा तक वामपंथी उग्रवाद को बस्तर जैसे सबसे मजबूत गढ़ों से काफी पीछे धकेल दिया गया है।नक्सलवाद की समाप्ति के दावों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि जमीनी कार्रवाई में बड़ी सफलता सुरक्षाबलों ने नक्सल विरोधी अभियानों में भारी सफलता हासिल की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में सैकड़ों कुख्यात नक्सली कमांडरों को मुठभेड़ में मार गिराया गया है और हजारों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है। घटता दायरा (रेड कॉरिडोर)कभी देश के करीब 180 जिलों में फैला नक्सली प्रभाव अब सिमटकर बहुत ही कम क्षेत्रों (मुख्य रूप से दक्षिण छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों) तक रह गया है। मध्य प्रदेश जैसे कई राज्यों को आधिकारिक तौर पर नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है लेकिन अभी नक्सली मानसिकता का समूल नष्ट करना बाकी है।
आपको बता दें कि भारत के लिए नक्सलवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं था, बल्कि यह देश की आंतरिक सुरक्षा, लोकतांत्रिक व्यवस्था और आदिवासी समाज के भविष्य से जुड़ा एक गहरा संकट था। दशकों तक नक्सल हिंसा ने देश के अनेक हिस्सों, विशेषकर छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे क्षेत्रों को भय, अविश्वास और पिछड़ेपन के अंधेरे में धकेले रखा। उससे मुक्ति निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर को नक्सलवाद से मुक्त बताते हुए यह भी कहा कि अब सरकार की जिम्मेदारी पिछले 50 वर्षों के नुकसान की भरपाई करना है और बस्तर को देश के सबसे विकसित आदिवासी क्षेत्रों में शामिल करना है। सरकारी बयान के अनुसार, 3,000 आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों को सम्मानजनक जीवन देने और बस्तर को विकसित भारत की यात्रा से जोड़ने पर जोर दिया गया है। ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बस्तर से यह कहना कि भारत नक्सलवाद से मुक्का हो चुका है, निःसंदेह एक ऐतिहासिक क्षण है। यह घोषणा केवल सरकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि उन हजारों जवानों, पुलिसकर्मियों, स्थानीय आदिवासियों और निदर्दोष नागरिकों के संघर्ष की परिणति है, जिन्होंने इस लंबी लड़ाई में अपनी जान, परिवार और भविष्य तक दांव पर लगा दिया। नक्सलवाद का इतिहास देश के लिए पीड़ा से भरा रहा है। 1970 के दशक से लेकर लंबे समय तक यह हिंसक विचारधारा गरीबों, आदिवासियों और वंचितों के नाम पर बंदूक की राजनीति करती रही। जिन लोगों के अधिकारों की बात कर नक्सल आंदोलन खड़ा किया गया था, सबसे अधिक नुकसान भी उन्हीं गरीबों और आदिवासियों को उठाना पड़ा। स्कूल जलाए गए, सड़कें नहीं बनने दी गई, स्वास्थ्य केंद्रों का विरोध हुआ, सरकारी योजनाओं को गांवों तक पहुंचने से रोका गया और युवाओं को शिक्षा के बजाय हथियार थमा दिए गए।
आपको पता है कि यह विडंबना ही थी कि विकास के नाम पर शुरू हुआ आंदोलन विकास का सबसे बड़ा विरोधी बन गया। बस्तर इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। प्राकृतिक संपदा, आदिवासी संस्कृति और मानवीय संभावनाओं से भरपूर यह क्षेत्र लंबे समय तक भय का दूसरा नाम बना रहा। रात में आवाजाही चंद, गांवों में खामोशी, स्कूलों में ताले, सड़क निर्माण पर हमला और सुरक्षा बलों पर घात लगाकर वार, यह सब बस्तर की सामान्य पहचान बन चुका था। नक्सलियों के डर के कारण सरकारी योजनाएं कागजों में रह जाती थीं और आम आदिवासी नागरिक अपने ही देश की विकास यात्रा से कट जाता था। थान की खरीद, मुफ्त राशन्, शिक्षा, नौकरी में आरक्षण, स्वास्थ्य रक्षण, स्वास्थ्य सुविधा और सड़क जैसी बुनियादी वीजें भी कई इलाकों में सपने जैसी थीं। इसलिए जब गृह मंत्री ने कहा कि बस्तर के लिए यह बड़ा दिन है और देश नक्सलवाद से मुक्त हो चुका है, तो यह बयान केवल राजनीतिक घोषणा नहीं माना जाना चाहिए। यह उन सुरक्षा बलों के परिश्रम की मान्यता है, जिन्होंने बेहद कठिन भौगोलिक परिस्थिति, जंगलों, पहाड़ियों और बारूदी सुरंगों के बीच संघर्ष किया। सीआरपीएफ, कोबरा कमांडो, डीआरजी, राज्य पुलिस और स्थानीय सुरक्षा बलों ने जिस साहस, धैर्य और रणनीति के साथ अभियान चलाए, यह भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस सफलता में स्थानीय आदिवासी समाज की भूमिका भी कम नहीं है। जब स्थानीय जनता का भरोसा शासन और सुरक्षा बलों पर बढ़ता है, तभी किसी भी हिंसक आंदोलन की जमीन कमजोर होती है। नक्सलवाद के खिलाफ जीत केवल सैन्य या पुलिस कार्रवाई से संभव नहीं थी। इसकी असली सफलता सुरक्षा और विकास के संतुलित मॉडल में निहित है। यदि बंदूक के जवाब में केवल बंदूक होती, तो समस्या शायद कमजोर होती, लेकिन समास नहीं होती। नक्सलवाद को जड़ से खत्म करने के लिए जरूरी था कि गांवों तक सड़क पहुंचे, बच्चों तक स्कूल पहुंचे, बीमारों तक अस्पताल पहुंचे और युवाओं तक रोजगार पहुंचे। अब जब सरकार यह कह रही है कि बस्तर को देश का सबसे विकसित आदिवासी क्षेत्र बनाया जाएगा, तो मही इस सफलता की अगली कसौटी होगी। गृह मंत्री द्वारा केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के 70 कैंपों को विकास के यन-स्टॉप सेंटर के रूप में विकसित करने की बात अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि जो कैप पहले केवल सुरक्षा के प्रतीक थे, वे अब सरकारी योजनाओं, जनसेवा और विश्वास निर्माण के केंद्र बनेंगे। यदि इन केंद्रों के माध्यम से आदिवासियों को 370 सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे मिले, तो यह बस्तर की दिशा बदल सकता है। लेकिन इसके लिए कागजी घोषणा से अधिक जमीन पर ईमानदार क्रियान्वयन की आवश्यकता होगी। अधिकारी गांवों तक जाएं, आदिासी भाषाओं और संस्कृति को समझें, स्थानीय जरूरतों के आधार पर योजनाएं बनें और भ्रष्टाचार को सख्ती से रोका जाए। इसके लिए जमीन अधिकार, चन अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, इंटरनेट, सड़क, पेयजल और स्थानीय भागीदारी को प्राथमिकता देनी होगी। आदिवासी समाज को विकास का केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि भागीदार बनाना होगा। बस्तर का विकास दिल्ली या रायपुर के दफ्तरों से नहीं, बल्कि बस्तर के गांचों, युवाओं, महिलाओं और पारंपरिक नेतृत्व की सहभागिता से तय होना चाहिए। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कभी माओवादी हिंसा को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती चताया था। यह स्वीकारोक्ति इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती थी। यदि आज देश उस चुनौती से निर्णायक मुक्ति की ओर बढ़ा है, तो यह भारतीय राज्य की दीर्घकालिक क्षमता, सुरक्षा बलों के त्याग और लोकतांत्रिक शासन की मजबूती का प्रमाण है। मोदी सरकार के कार्यकाल में आंतरिक सुरक्षा, विकास और निर्णायक नीति निर्माण को लेकर कई बड़े कदम उठाए गए हैं। नक्सलवाद के विरुद्ध मिली सफलता उनमें अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाएगी, क्योंकि इसका सीधा संबंध आम नागरिक की सुरक्षा और राष्ट्र की अखंडता से है। बस्तर की देश का सबसे विकसित आदिवासी क्षेत्र बनाने का लक्ष्य केवल एक राजनीतिक बादा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है। जिन गांवों ने दशकों तक गोली की आवाज सुनी, यहां अब स्कूलों की घंटी बजनी चाहिए। जिन रास्तों पर बारूदी सुरंगें बिछाई जाती थीं, वहां अब एम्बुलेंस, बसें और बाजार पहुंचने चाहिए। जिन युवाओं को बंदूक दी गई थी, उनके हाथों में अब किताब, कंप्यूटर और रोजगार के अवसर होने चाहिए। यही नक्सलवाद पर अंतिम और वास्तविक विजय होगी। (मनोज कुमार अग्रवाल-हिफी फीचर)

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