चुनाव में हार जीत तो होती ही रहती है लेकिन पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव- 2026 ने ममता बनर्जी को स्तब्ध कर दिया है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर 80 सदस्य ही निर्वाचित हो पाये थे। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। ममता बनर्जी अपने गढ में ही शुभेन्दु से पराजित हो गयीं। इसके बाद ही वह कई आशंकाओं से ग्रस्त हो गयी थीं। पार्टी को एकजुट रखने के मकसद से ममता ने अपने आवास पर पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई थी लेकिन उसमें करीब 20 विधायक ही पहुंचे। उसके कारण बैठक रद्द करनी पड़ी और आशंकाएं बढती गयीं। ममता बनर्जी ने चार बार की सांसद रही काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में पार्टी के मुख्य सचेतक के पद से हटा दिया था। उसके बाद काकोली ने सोशल मीडिया पर अपनी एक पोस्ट में कहा था कि उनको चार दशकों की निष्ठा का फल मिला है। इस प्रकार तृणमूल कांग्रेस में बगावत के स्वर सुनाई पडने लगे । दरअसल बीते सप्ताह विधानसभा में पार्टी विधायक दल का नेता चुनने के लिए जो बैठक हुई थी उसमें पारित प्रस्ताव पर कथित तौर पर उन विधायकों के भी हस्ताक्षर थे जो उस बैठक में हाजिर ही नहीं थे। इस पर तृणमूल के ही दो विधायकों- ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से इसकी शिकायत की थी। उसके बाद सरकार ने इस मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी थी इस पर तृणमूल के ही दो विधायकों- ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने विधानसभा अध्यक्ष से इसकी शिकायत की थी। उसके बाद सरकार ने इस मामले की जांच सीआईडी को सौंप दी थी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन दोनों विधायकों के नाम को सार्वजनिक भी किया था। उसके पंद्रह मिनट के भीतर ही दोनों विधायकों को पार्टी से निकाल दिया गया। इस प्रकार ऋतब्रत बनर्जी खुलकर बगावत पर उतर आए। उनके साथ तृणमूल-कांग्रेस के 58 विधायक हैं। हालांकि दावा 60 विधायकों का किया जा रहा है। विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी विधायकों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार करते हुए विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी है। ऋतब्रत ने पत्रकारों से कहा, तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले दो-तिहाई विधायक एकजुट हैं। हमें 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। दो विधायक फिलहाल राज्य से बाहर हैं। हम सदन में भाजपा का मजबूती से सामना करेंगे। ऋतब्रत ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से संसदीय दल का सलाहकार बनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी के साथ उनका कोई संबंध नहीं है। विधानसभा चुनाव में पराजय के बाद पार्टी में तेज होती बगावत और इस्तीफों के सिलसिले को देखते हुए राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है कि क्या पराजय की सुनामी में तृणमूल कांग्रेस ढह गयी है अथवा महाराष्ट्र की कहानी दोहराई जा रही है।
तृणमूल कांग्रेस ने 3 जून को पश्चिम बंगाल में अपनी सभी संगठनात्मक समितियां भंग कर दीं और पार्टी ढांचे की व्यापक समीक्षा की घोषणा की। यह नाटकीय कदम पार्टी के विधायकों की बगावत की पृष्ठभूमि में उठाया गया है। तृणमूल ने ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियां और उसके सभी अग्रिम संगठन तत्काल प्रभाव से भंग कर दिए गए हैं।
यह फैसला ऐसे समय आया है, जब कुछ घंटे पहले ही तृणमूल के बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष से अलग विधायक दल के रूप में मान्यता देने का अनुरोध किया। हालिया चुनावी हार के बाद इस कदम ने पार्टी के भीतर जारी राजनीतिक खींचतान को और गहरा कर दिया है। पार्टी ने अपने बयान में कहा, ‘‘काफी विचार विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां और उसके सभी अग्रिम संगठन तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे।’’पार्टी ने कहा कि वह ‘‘हर स्तर पर आत्ममंथन, प्रदर्शन समीक्षा और संगठनात्मक मूल्यांकन का व्यापक तरीके से आकलन’’ करेगी। बयान में कहा गया, ‘‘इस अभ्यास के निष्कर्षों के आधार पर मूल संगठन और सभी अग्रिम संगठनों के ढांचे का पुनर्गठन किया जाएगा और उचित समय पर इसकी घोषणा की जाएगी।’’हालांकि पार्टी ने इस फैसले के कारणों के बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी।
राजनीतिक विश्लेषक इस कदम को जारी राजनीतिक संकट के बीच नेतृत्व द्वारा संगठन पर नियंत्रण वापस पाने और पार्टी तंत्र के पुनर्गठन का रास्ता खोलने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
तृणमूल ने सोशल मीडिया पोस्ट में यह भी कहा, ‘‘पार्टी अपने संगठन को मजबूत करने और उसे नयी ऊर्जा देने व नए उद्देश्य के साथ भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है।’’यह घटनाक्रम तृणमूल के गठन के बाद से लिये गए सबसे बड़े संगठनात्मक फैसलों में से एक है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की हार के बाद रोजाना कोई न कोई ऐसा घटनाक्रम सामने आ रहा है जिसने पार्टी को सुर्खघ्यिों में बनाए रखा है। सोनारपुर में पार्टी महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी पर स्थानीय लोगों ने हमला किया और उन पर अंडे फेंके। वहीं अगले दिन टीएमसी के एक और सांसद कल्याण बनर्जी ने खघ्ुद पर हमला किए जाने का आरोप लगाया। अगले ही दिन एक और मामला सामने आया जब तृणमूल कांग्रेस ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में अपने दो विधायकों, ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोशल मीडिया पर राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा। उधर विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु ने बागी विधायकों की ओर से सौंपे गए समर्थन पत्र को स्वीकार करते हुए विपक्ष के नेता के लिए आवंटित कक्ष की चाबी ऋतब्रत को सौंप दी। ऋतब्रत ने पत्रकारों से कहा, तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर जीतने वाले दो-तिहाई विधायक एकजुट हैं। हमें 60 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। दो विधायक फिलहाल राज्य से बाहर हैं। हम सदन में भाजपा का मजबूती से सामना करेंगे। ऋतब्रत ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से संसदीय दल का सलाहकार बनने की अपील की है। उन्होंने कहा कि अभिषेक बनर्जी के साथ उनका कोई संबंध नहीं है। इस प्रकार यह मामला महाराष्ट्र में शिवसेना से एकनाथ शिंदे की बगावत की कहानी की याद दिलाता है। अब यह देखना है कि जिस प्रकार एकनाथ शिंदे ने अपने गुट को असली शिवसेना बताया और चुनाव आयोग ने मान्यता भी दे दी क्या उसी प्रकार ऋतब्रत भी तृणमूल कांग्रेस के असली वारिस बन जाएंगे। ममता बनर्जी अभी इसके पीछे भाजपा की साजिश बता रही हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस अब तक के सबसे भीषण संकट में दिखाई पड रही है। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)






