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विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की दिल्ली में हुई बैठक में भाजपा के खिलाफ एकजुटता का संदेश तो दिया गया, लेकिन बैठक के भीतर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच भविष्य के शक्ति संतुलन की लड़ाई की झलक भी साफ दिखाई दी। वरिष्ठ नेता शरद पवार के संदेश में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी कि सदस्य दल अड़ियल रवैए को छोड़कर हर हाल में एकजुट रहें, तभी भाजपा का मुकाबला किया जा सकता है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कांग्रेस, खासकर राहुल गांधी को यह स्पष्ट संदेश दिया कि विपक्षी एकता तभी मजबूत रह सकती है, जब क्षेत्रीय दलों को उनकी राजनीतिक ताकत के अनुरूप स्थान दिया जाए। अखिलेश यादव ने द्रमुक और आम आदमी पार्टी की अनुपस्थिति का मुद्दा उठाते हुए कहा कि विपक्षी खेमे से जुड़े दलों को साथ बनाए रखने की जिम्मेदारी कांग्रेस को निभानी होगी। उन्होंने संकेत दिया कि सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस को अधिक उदार और समन्वयकारी भूमिका अपनानी चाहिए। कांग्रेस ने सत्ता की मलाई खाने के लिए ही द्रमुक का साथ छोड़कर विजय की टीवीके को समर्थन दिया। इंडिया गठबंधन में द्रमुक ही कांग्रेस की सबसे बड़ी समर्थक थी। बैठक में उसने हिस्सा नहीं लिया। अखिलेश यादव का यह संकेत कांग्रेस को गंभीरता से लेना होगा।
इंडिया गठबंधन की बैठक में अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कांग्रेस को पिछले लोकसभा चुनाव का गणित भी याद दिलाया। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के तहत कांग्रेस को 17 सीटें दी थीं, जिनमें कांग्रेस छह सीटें जीतने में सफल रही। उनका संकेत साफ था कि गठबंधन की सफलता केवल कांग्रेस की नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के संगठन, कार्यकर्ताओं और सामाजिक आधार की भी देन थी। दरअसल, अखिलेश का यह बयान केवल पुराने चुनाव का मूल्यांकन नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपनी राजनीतिक स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश भी है। समाजवादी पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि उत्तर प्रदेश में विपक्षी राजनीति का केंद्र वही है और भविष्य के किसी भी सीट बंटवारे में उसकी भूमिका निर्णायक रहेगी। दिलचस्प यह है कि भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर साझा संघर्ष की बात करने के साथ-साथ क्षेत्रीय दल कांग्रेस पर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी अपना रहे हैं। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में द्रमुक, बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस को महत्वपूर्ण सहयोगी तो मानते हैं, लेकिन नेतृत्वकारी भूमिका देने के पक्ष में नहीं दिखाई देते।
यही वजह है कि इंडिया गठबंधन की बैठक में अखिलेश और तेजस्वी की जुगलबंदी केवल एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं थी। इसे आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की राजनीतिक अहमियत और जमीनी ताकत का एहसास कराने वाले स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है। विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन में शामिल दलों की बैठक से पहले ही इंडिया गठबंधन में कथित फूट को लेकर कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर पोस्टर लगे थे। हालांकि यह साफ नहीं हो पाया कि ये पोस्टर किसने लगाए थे। विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों की एकजुट होकर आगे बढ़ने की रणनीति पर चर्चा करने के लिए 8 जून को मीटिंग होनी थी। दिल्ली के ‘कॉन्स्टीट्यूशन क्लब’ में हुई इस बैठक से पहले ही इंडिया गठबंधन में कथित फूट को लेकर कंस्टीट्यूशन क्लब के बाहर पोस्टर लगे। पोस्टर में इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर सवाल उठाए गए थे। इन पोस्टर में एनसीपी-एससीपी प्रमुख शरद पवार, टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी, डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन और आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की फोटो लगी थी। कांग्रेस और राहुल गांधी पर सवाल खड़े किए गए थे।
पाँच जून, 2024 को दिल्ली में इंडिया गठबंधन ने आखघ्रिी बैठक की थी। इसके ठीक दो साल बाद छह जून को दिल्ली में ही इस प्रमुख विपक्षी गठबंधन की बैठक हुई । इन दो सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। तब 25 क्षेत्रीय पार्टियों ने बैठक में हिस्सा लिया था। इस बार ये संख्या घटकर 23 रह गई। तब पार्टी की बैठक में गैर कांग्रेसी पाँच मुख्यमंत्री शामिल हुए थे। इस बार महज एक गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला थे। अब आम आदमी पार्टी, आरजेडी, टीएमसी, डीएमके समेत अन्य कई पार्टियों के लिए राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं। हालांकि गठबंधन को मजबूत करने के लिए इंडिया ब्लॉक ने अब हर दो महीने में बैठक करने का फैसला किया है। बीजेपी के उभार के बाद देश भर में क्षेत्रीय पार्टियां कमजोर हुई हैं। क्षेत्रीय पार्टियों से चुनौती न केवल बीजेपी को मिलती थी बल्कि कांग्रेस को भी मिलती थी। ऐसे में इंडिया गठबंधन में अभी कांग्रेस मजबूत स्थिति में है।
अभी के हालात में आरजेडी और टीएमसी जैसी पार्टियां कांग्रेस को बहुत झुकाने की स्थिति में नहीं हैं। बीते दो साल में ये गठबंधन एक ऑप्टिक्स, एक नारा बनकर रह गया था। अब हर दो महीने में मिलेंगे, भले लड़ेंगे-भिड़ेंगे, जो भी बातें होंगी और जो भी मुद्दे सामने आएंगे, इससे कुछ तो निकलेगा। ब्लॉक की अगली बैठक हैदराबाद में एक अगस्त यानी दो महीने बाद होना तय हुआ है। यह अहम है कि संसद सत्र के दौरान विपक्षी दल हर दिन जो मीटिंग करेंगे, वह लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अध्यक्षता में होगी। यानी राहुल गांधी संसद के फ्लोर कोऑर्डिनेशन में विपक्ष की रणनीति की अध्यक्षता करेंगे। राहुल गांधी को अब तक इंडिया ब्लॉक ने अपना संयोजक तय नहीं किया है, लेकिन एक कदम उसकी ओर ले लिया है। तमिलनाडु से कोई प्रतिनिधित्व न मिलने को इस गठबंधन के लिए एक प्रमुख चिंता माना गया है। जब सभी रीजनल पार्टियां कांग्रेस की लीडरशिप को नहीं स्वीकारना चाहती थीं, तब सिर्फ डीएमके इसमें अपवाद थी।
उसने ही इंडिया गठबंधन में राहुल गांधी की अध्यक्षता की मांग की थी लेकिन अब तो वो इंडिया ब्लॉक से ही हट गया है क्योंकि कांग्रेस टीवीके नेता विजय के साथ चली गई है और तमिलनाडु में सत्ता का सुख भोग रही है। मुख्यमंत्री विजय (टीवीके) इतनी जल्दी इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं होने वाले हैं। ऐसे में तमिलनाडु का इसमें (इंडिया ब्लॉक) कोई प्रतिनिधित्व ही नहीं है। कांग्रेस को यह समझना पड़ेगा कि जिस राज्य में उसका असर है, वो वहां तो लीड ले सकती है, मगर जहाँ वो कमजोर हैं, वहाँ अपने सहयोगियों को आगे करे।
यूपी का उदाहरण लेते हैं । देखना होगा कि यहां कांग्रेस किस रणनीति पर आगे बढ़ेगी, यह गठबंधन ही बहुत कुछ तय करेगा। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों और इन क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस की जरूरत है, वे जितनी जल्दी ये समझ लेंगे, उनके गठबंधन का रास्ता आसान हो जाएगा। देश की 543 लोकसभा सीटों में से 254 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस का वोट प्रतिशत एक अंक में है।पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, दिल्ली, बिहार, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट प्रतिशत दहाई से नीचे है। यह बात अखिलेश यादव भी जानते हैं। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)

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