अमेरिका की एक संघीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आव्रजन नीति को बड़ा झटका देते हुए एच-1बी वीजा पर लगाए गए 1 लाख डॉलर के अतिरिक्त शुल्क को अवैध करार दिया है। बोस्टन की संघीय अदालत के न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने 8 जून 2026 को दिए गए अपने फैसले में कहा कि यह शुल्क वास्तव में एक कर था, जिसे लगाने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है। राष्ट्रपति अपने अधिकारों का उपयोग करके ऐसा कर नहीं लगा सकते। यह फैसला न केवल अमेरिकी आव्रजन नीति के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन हजारों विदेशी पेशेवरों और कंपनियों के लिए भी राहत लेकर आया है जो एच-1बी वीजा कार्यक्रम पर निर्भर हैं।
एच-1बी वीजा अमेरिका का एक विशेष कार्यक्रम है जिसके तहत विदेशी कुशल पेशेवरों को अमेरिकी कंपनियों में काम करने की अनुमति दी जाती है। यह कार्यक्रम विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, अनुसंधान और वित्तीय क्षेत्रों में काम करने वाले उच्च प्रशिक्षित कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। हर वर्ष 65,000 सामान्य एच-1बी वीजा जारी किए जाते हैं, जबकि अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उच्च डिग्री प्राप्त करने वालों के लिए अतिरिक्त 20,000 वीजा उपलब्ध होते हैं। भारत इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी देश रहा है और बड़ी संख्या में भारतीय आईटी पेशेवर इसी माध्यम से अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं।
सितंबर 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने एक घोषणा के माध्यम से नए एच-1बी वीजा आवेदनों पर 1 लाख डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगा दिया था। इससे पहले किसी कंपनी को एक विदेशी कर्मचारी के लिए एच-1बी वीजा प्राप्त करने हेतु लगभग 2,000 से 5,000 डॉलर तक की फीस देनी पड़ती थी। नए नियम के लागू होने के बाद यह लागत कई गुना बढ़ गई। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि यह शुल्क अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा करने और विदेशी कर्मचारियों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है।
हालांकि इस फैसले को अमेरिका के 20 डेमोक्रेटिक राज्यों के अटॉर्नी जनरल ने अदालत में चुनौती दी। उनका कहना था कि राष्ट्रपति ने अपने संवैधानिक अधिकारों से आगे बढ़कर ऐसा कदम उठाया है। अमेरिकी संविधान के अनुसार कर लगाने और राजस्व से जुड़े निर्णय लेने का अधिकार कांग्रेस के पास है। इसलिए राष्ट्रपति द्वारा एकतरफा ढंग से इतना बड़ा शुल्क लगाना संविधान की भावना के विरुद्ध है।
न्यायाधीश लियो सोरोकिन ने अपने फैसले में प्रशासन की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि सरकार इस शुल्क को दंड बता रही है, लेकिन इसकी वास्तविक प्रकृति एक कर जैसी है। उन्होंने कहा कि किसी शुल्क को क्या नाम दिया गया है, यह महत्वपूर्ण नहीं हैय महत्वपूर्ण यह है कि उसका वास्तविक प्रभाव क्या है। चूंकि यह शुल्क राजस्व संग्रह का कार्य कर रहा था और इसके लिए कांग्रेस की अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए यह अवैध है।
यह फैसला ट्रंप प्रशासन की उस व्यापक नीति पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है जिसमें आव्रजन को सीमित करने के लिए कार्यकारी आदेशों और प्रशासनिक उपायों का उपयोग किया गया। ट्रंप लंबे समय से अमेरिका फर्स्ट नीति के समर्थक रहे हैं। उनका मानना रहा है कि विदेशी श्रमिक अमेरिकी नागरिकों की नौकरियां छीन लेते हैं और वेतन स्तर को प्रभावित करते हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल और वर्तमान प्रशासन दोनों में कई कठोर आव्रजन नीतियों को लागू करने का प्रयास किया है।
लेकिन आंकड़े बताते हैं कि एच-1बी कार्यक्रम अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रौद्योगिकी क्षेत्र की कई बड़ी कंपनियां- विशेषकर सॉफ्टवेयर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अनुसंधान से जुड़ी कंपनियां- विदेशी प्रतिभा पर निर्भर हैं। उनका तर्क है कि अमेरिका में हमेशा पर्याप्त संख्या में योग्य विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होते और वैश्विक प्रतिभा को आकर्षित करना देश की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
1 लाख डॉलर के शुल्क का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। अदालत में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार फरवरी 2026 तक केवल 85 कंपनियों ने यह शुल्क जमा किया था। यह संख्या सामान्य वर्षों की तुलना में बेहद कम थी। इससे संकेत मिलता है कि अत्यधिक शुल्क ने कंपनियों को नए एच-1बी आवेदन करने से हतोत्साहित किया। कई कंपनियों ने भर्ती योजनाओं को टाल दिया या अन्य देशों में निवेश बढ़ाने के विकल्प तलाशने शुरू कर दिए।
भारतीय पेशेवरों के दृष्टिकोण से यह फैसला विशेष महत्व रखता है। भारत से आने वाले इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा वैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के सबसे बड़े लाभार्थी समूहों में शामिल हैं। यदि यह शुल्क लागू रहता, तो अमेरिकी कंपनियों के लिए भारतीय कर्मचारियों को नियुक्त करना अत्यधिक महंगा हो जाता। इसका सीधा असर भारतीय आईटी उद्योग, वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और अमेरिका में रोजगार की संभावनाओं पर पड़ सकता था।
इस फैसले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। यह अमेरिकी शासन व्यवस्था में शक्तियों के संतुलन की अवधारणा को पुनः स्थापित करता है। अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति, कांग्रेस और न्यायपालिका के बीच अधिकारों का स्पष्ट विभाजन करता है। अदालत का यह निर्णय दर्शाता है कि न्यायपालिका कार्यपालिका के निर्णयों की समीक्षा कर सकती है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें निरस्त भी कर सकती है। यह लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती का संकेत माना जा रहा है।
हालांकि यह विवाद अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ट्रंप प्रशासन इस फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो मामला आगे की न्यायिक प्रक्रिया से गुजरेगा। लेकिन फिलहाल यह निर्णय उन कंपनियों और विदेशी पेशेवरों के लिए राहत लेकर आया है जो बढ़ी हुई फीस के कारण अनिश्चितता का सामना कर रहे थे।
एच-1बी वीजा शुल्क पर संघीय अदालत का फैसला अमेरिकी आव्रजन नीति, संवैधानिक अधिकारों और वैश्विक श्रम बाजार के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण घटना है। इस निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रोजगार संरक्षण जैसे मुद्दों पर भी सरकार संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं से बाहर नहीं जा सकती। साथ ही यह फैसला अमेरिका की नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था के लिए वैश्विक प्रतिभा के महत्व को भी रेखांकित करता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ट्रंप प्रशासन इस निर्णय पर क्या प्रतिक्रिया देता है और अमेरिकी आव्रजन नीति किस दिशा में आगे बढ़ती है। (वीपी राहुल-हिफी फीचर)






