प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गत 5 मई 2026 को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में जजों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। इस पर मतभेद जताए गये थे। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि इस अध्यादेश ने सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन किया है, जिससे सीजेआई को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़कर 37 हो गई है। केंद्रीय कैबिनेट के उस फैसले को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी है, जिसमें सीजेआई समेत सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 38 करने का प्रस्ताव था। इससे पहले
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों (सीईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार के 2023 कानून की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। कोर्ट ने इसे कार्यपालिका के पास प्रभावी वीटो और बहुमत की तानाशाही करार दिया था। यह पूरा विवाद मुख्य रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 को लेकर है। इस कानून के तहत बनी समिति में पी एम, लीडर ऑफ अपोजीशन और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट के 2023 के ऐतिहासिक फैसले में सीजेआई को भी इस समिति का हिस्सा बनाने का निर्देश दिया गया था ताकि चयन प्रक्रिया सरकारी प्रभाव से मुक्त रहे। अब केंद्रीय कैबिनेट के उस फैसले को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जब मंजूरी दे दी है, जिसमें सीजेआई समेत सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 38 करने का प्रस्ताव था तो दोनों मामलों को एकसाथ जोड़कर देखा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि लोकतंत्र की इन दो बड़ी और अति महत्वपूर्ण संस्थाओं के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।
सुप्रीम कोर्ट अधिनियम में संशोधन के संबंध में अध्यादेश जारी कर दिया गया है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी भी दे दी है। इसको लेकर सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि इस अध्यादेश ने सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन किया है, जिससे सीजेआई को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़कर 37 हो गई है। इससे पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 5 मई को हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में जजों की संख्या बढ़ाने के इस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। सरकार ने इस वृद्धि को औपचारिक रूप देने के लिए संसद में सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पेश करने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दे दी थी।
सरकार के मुताबिक, शीर्ष अदालत की क्षमता को मजबूत करना बेहद जरूरी हो गया था। वैसे देखा जाए तो वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 92,000 से अधिक मामले लंबित हैं। ऐसे में जजों की संख्या बढ़ने से मुकदमों की सुनवाई में तेजी आएगी और आम जनता को समय पर न्याय मिल सकेगा।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) के तहत संसद को यह कानूनन अधिकार प्राप्त है कि वह कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित कर सके। बढ़ते मुकदमों को देखते हुए समय-समय पर जजों की संख्या में बदलाव किया जाता रहा है। सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 में शुरू में जजों की संख्या 10 तय की गई थी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश शामिल नहीं थे। बाद में 1960 में इसे बढ़ाकर 13, 1977 में 17, 1986 में 25 और 2008 में 30 कर दिया गया। आखिरी बार इसमें 2019 में बदलाव किया गया था, जब संसद ने जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 कर दी थी। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल नहीं थे।
कानून मंत्रालय की ओर से जारी नोटिफिकेशन में लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से अध्यादेश जारी किया गया है। संविधान के अनुच्छेद 123(1) के तहत प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए, राष्ट्रपति ने यह अध्यादेश जारी किया है। इस अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 कहा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट (जजों की संख्या) अधिनियम, 1956 की धारा 2 में 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाती है।
संविधान के अनुच्छेद 124 (1) में अन्य बातों के साथ-साथ यह प्रावधान किया गया है कि भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा, जिसमें भारत का एक मुख्य न्यायाधीश और संसद द्वारा कानून द्वारा अधिक संख्या निर्धारित न किए जाने तक सात से अधिक अन्य न्यायाधीश नहीं होंगे।
सरकार के इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमों की संख्या कम करना है लेकिन सबसे बड़ी अदालत पर सरकार का शिकंजा कसता भी दिख रहा है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए 1956 में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम 1956 के तहत एक अधिनियम पारित किया गया था। अधिनियम की धारा 2 में न्यायाधीशों की अधिकतम संख्या (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) 10 निर्धारित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 1960 द्वारा बढ़ाकर 13 कर दिया गया था और सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 1977 द्वारा बढ़ाकर 17 कर दिया गया था। हालांकि, भारत के सर्वोच्च न्यायालय की कार्यकारी संख्या को मंत्रिमंडल द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर 1979 के अंत तक 15 न्यायाधीशों तक सीमित कर दिया गया था, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश के अनुरोध पर इस प्रतिबंध को हटा दिया गया था।
सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 1986 ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर, सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 17 से बढ़ाकर 25 कर दी। इसके बाद, सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2008 ने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 25 से बढ़ाकर 30 कर दी।भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को इससे पहले अंतिम बार 30 से बढ़ाकर 33 कर दिया गया था (भारत के मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर), मूल अधिनियम में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से और संशोधन करके। उसके बाद अब यह संशोधन किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों (सी ईसी) की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार के 2023 कानून की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को शामिल करने पर कड़ी आपत्ति जताई है। कोर्ट ने इसे कार्यपालिका के पास प्रभावी वीटो और बहुमत की तानाशाही करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह स्वतंत्रता का दिखावा क्यों? कोर्ट ने पूछा है कि जब समिति में प्रधानमंत्री और उनके ही द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री शामिल हों, तो विपक्ष के नेता (एलओपी) को रखने का औचित्य ही क्या है, क्योंकि फैसला हमेशा 2-1 के बहुमत से सरकार के पक्ष में ही जाएगा। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने सवाल किया कि जब सीबीआई निदेशक के चयन पैनल में सीजेआई शामिल होते हैं, तो चुनाव आयोग (जो कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है) की नियुक्ति समिति में न्यायपालिका या कोई तटस्थ सदस्य क्यों नहीं होना चाहिए? कोर्ट ने पूर्व में की गई नियुक्तियों (जैसे ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति) के दौरान जल्दबाजी और विपक्ष के साथ उम्मीदवारों की पूरी जानकारी साझा न करने पर भी चिंता जताई थी। अदालत ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र के मूल ढांचे का हिस्सा हैं, जिसके लिए चुनाव आयुक्तों का चयन भी स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से दिखना चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट अधिनियम में संशोधन पर भी इसी तरह से सवाल उठ सकते हैं। (अशोक त्रिपाठी-हिफी फीचर)






