काली माता मंदिर में सुनहु कथा रघुनाथ की में उमड़ रहा है आस्था का सैलाब
राष्ट्र पटल संवाद
उदी (इटावा)। रामचरित मानस में भरत का कर्तव्य उनकी प्रत्येक क्रिया प्रभु राम को समर्पित रही है,यहां तक कि माता एवं गुरु द्वारा तथा अग्रज भाई राम ने भी उन्हें सत्ता संचालित कर प्रजा की रक्षा करने की जिम्मेदारी सौंपी लेकिन उन्होंने राज सत्ता को ठुकरा कर प्रभु की पादुका को सिंहासन पर रख उन्हें ही राजा माना क्यों कि वह मानते थे कि ” संपति सब रघुवर की अहही” उनका अदभुद भ्रात प्रेम जिसकी आज बहुत आवश्यकता है लेकिन वह नजर नहीं आता।
व्यास श्री पांडेय जी ने उदी में चल रही राम कथा में पांचवे दिन कहा कि प्रभु राम लक्ष्मण और माता सीता के वन गवन के उपरांत अयोध्या में संकट के बादल मंडराए और गुरु आज्ञा से भरत को ननिहाल से बुलाया गया। अयोध्या आगमन पर भरत ने जो देखा वह उनकी भावना और विचारों के प्रतिकूल था।
भरत ने सारा दोष अपनी माता कैकेई को दिया और कटु बच्चन कहकर मां कहने तक से मुंह मोड़ लिया । महलों में रुदन और भरत की स्थिति प्रतिकूल देख गुरु वशिष्ठ ने समझाया कि “” सुनहु भरत भावी प्रबल विलग कही मुनि नाथ, हानि लाभ जीवन, मरण, यश, अपयश, विधि हाथ। तब भरत ने भोर होते ही प्रभु राम को मनाने के लिए चलना निर्धारित कर लिया।
भरत जी ने सभी हाथी घोड़े अयोध्यावासियों तथा सभी (रानियों) माताओं को साथ लेकर प्रस्थान किया। लेकिन भरत की विशाल सेना जनता जनार्दन को देख निषादराज के मन में शंका हुई तो घाट की नाव को पानी में डूबो दिया और एक दूत को भेजकर उनके भाव बोध को समझा तब उन्हें नदी पार कर चित्रकूट पहुंचाया गया।
“उठे राम सुन प्रेम अधीरा कहूँ धनु कहूं निशंक पट चीरा” राम जी व्याकुल हो गए और “बरवस लिए उठाए उर लाए कृपा निधान, राम भरत की मिलन रख बिसरे सबही अपान” प्रभु ने भरत को उठकर गले से लगा लिया और माताओं की कुशल पूछी तभी माताएं वहाँ पहुंच गई और उन्हें देखकर वह कुछ क्षण के लिए विचलित हुए। उन्होंने भरत को बहु प्रकार समझाया लेकिन भरत अंत में प्रभु की खड़ाऊ पर अड गए। प्रभु कर करि कृपा पाहुनी दिन्ही, हर्षित भरत शीश धर लेनी” श्री राम की खड़ाऊ सिंहासन पर रख भरत जी ने 14 वर्ष बिताए।






