ईरान, अमेरिका और इजरायल का यह युद्ध जिसकी वजह से पूरी दुनिया आज भयंकर संकट में है और जिसके शुरू होने पर लगा था कि यह जल्दी ही निर्णायक स्थिति में पहुँच जायेगा, वह आज तक अनिश्चितता की स्थिति में है। रूस और यूक्रेन का युद्ध भी पाँच वर्षों से चल ही रहा है। इस बदलते माहौल में पर्यावरण पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है वह भी एक बहुत बड़ी चुनौती है जिससे निपटना भविष्य में दुष्कर नहीं तो मुश्किल तो अवश्य होगा। वर्तमान युद्ध की पृष्ठभूमि में जाएं तो विभिन्न अर्थव्यवस्थाएँ अनिश्चितताओं से घिरी दिखाई देती हैं। तमाम देश एक प्रकार के अविश्वास में डूबे और डरे हुए हैं।
ऐसे दौर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का बीजिंग जाना द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से तो महत्वपूर्ण है ही वैश्विक राजनीतिक दृष्टि से भी इसके अनेक संदेश हैं जो अहम हैं। इस यात्रा का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि ऐसा पिछले एक दशक में कभी भी नहीं हुआ कि पदस्थ अमेरिकी राष्ट्रपति चीन गया हो। पहली बार ट्रम्प चीन गए हैं, बात करने के लिए। अंततः दो महाशक्तियों का मिल कर बात करने का निर्णय यह बताता है कि वे दोनों इस बात से आश्वस्त हैं कि प्रतिस्पर्धा के टकराव को रोकने के लिए बात करना जरूरी है। वर्तमान में अभी इसका कोई मतलब स्पष्ट हो या न हो लेकिन इस यात्रा को भविष्य में वैश्विक राजनीति के बदलते संतुलन में एक निर्णायक मोड़ के रूप में अवश्य याद किया जायेगा, जिसके दूरगामी परिणाम सीधे तौर पर हमारे देश के रणनीतिक भविष्य को भी आकार दे सकते हैं। ईरान युद्ध के शुरू होने से लेकर अब तक हॉर्मुज से जहाजों की आवाजाही मे रुकावट आने से तेल और गेस की कमी तो हुई लेकिन सरकार ने अपने कुशल नेतृत्व और सूझ बूझ से इन बढ़ती कीमतों की आंच को जनता तक नहीं आने दिया। सारा बोझ अपने ही कंधों पर ले लिया जबकि वास्तविकता तो यह है कि हमारी तेल कंपनियों को 1000 करोड़ रुपये का नुकसान प्रतिदिन उठाना पड़ रहा है। इस युद्ध की वजह से सरकार को रू 68000 करोड़ का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा इस युद्ध का बोझ तेल भंडारों पर भी पड़ा रहा है। उनका स्तर निरंतर नीचे गिर रहा है जिसे यथावत बनाए रखने के लिए निवेश की आवश्यकता पड़ती है। इस सबका असर सेंट्रल एक्साइज पर भी पड़ रहा है यानी तीन अलग अलग दिशाओं में भारत को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
पिछले दिनों इन तेजी से बदलती परिस्थितियों के चलते पेट्रोल, डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी, थोक महंगाई का चार महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंचना, डॉलर के मुकाबले रुपए का तेजी से नीचे गिरना और प्रधानमंत्री द्वारा देशवासियों से संयम बरतने की अपील करना, इन सभी अलग अलग समय पर घटी घटनाओं के साथ उस वैश्विक उथल पुथल के परस्पर जुड़े होने का स्पष्ट संकेत हैं जिनकी जड़ें पश्चिम एशियाई युद्ध में छिपी हैं।
इस कठिन वक्त में सरकार के सामने जो चुनौतियाँ हैं उनमें प्रमुख है तेल भंडार। भारत का तेल भंडार आज 5.33 पर है जो लगभग दो सप्ताह की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आई ई ई ए मानक नब्बे दिनों का है। चंडीखोल पार्दु और बीकानेर में 6.5 मिलियन टन का दूसरा चरण निर्माणाधीन है। इसे शीघ्र ही समय सीमा के अंदर पूरा करना होगा। वैश्विक ऊर्जा संकट के दौर में जापान और दक्षिण कोरिया के बाद भारत ही एक ऐसा देश है जो तीस दिवसीय एल पी जी भंडार की योजना बना रहा है।
दूसरी चुनौती रिफाइनिंग और घरेलू उत्पादन की है हमारी सरकार अपनी रिफाइनिंग क्षमता को लगातार बढ़ाने का काम कर रही है। इसके लिए सरकार द्वारा पहले ही महत्वपूर्ण कदम उठाए जा चुके हैं। तीसरी चुनौती इथनॉल ब्लेंडिंग की है, आज बीस प्रतिशत ब्लेंडिंग करके देश 1.5 लाख करोड़ से अधिक की विदेशी मुद्रा बना पा रहा है। इस कठिन समय में वैकल्पिक ईंधन के माध्यम से एल पी जी की मांग को 70 से 75 हजार टन प्रतिदिन कम किया जा रहा है। आर्थिक नीतियों के जानकारों का कहना है कि यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि पी एन जी, मिट्टी का तेल, ईंधन तेल और बायो गेस की वैकल्पिक संरचना संकट आने से पहले ही तैयार कर ली गई थी।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि थोक मूल्य सूचकांक आधारित महँगाई मार्च में 3.88 फीसदी से बढ़कर अप्रैल में 8.3 फीसदी हो चुकी है। खुदरा स्तर पर कीमतें बढ़ाने के लिए सरकार पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। इससे जो चुनौतियाँ हमारे सामने आती हैं उनमे पहली है कि यदि यह महंगाई लंबे समय तक ऊंचाई पर ही बनी रहती है तो फिर उत्पादक इस बोझ को उपभोक्ताओं के ऊपर ही डालते हैं। मतलब यह है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें पहले से ही बढ़ी हुई हैं और यदि ईन्धन इसी रफ्तार से महंगा होता रहा तो परिवहन लागत बढ़ने से दाल, सब्जी, दूध और रोजमर्रा की अन्य चीजें भी महंगी होती जायेंगी जिसका दबाव अंततः आम आदमी की जेब पर पड़ेगा।
इस खतरनाक स्थिति और निरंतर गिरती अर्थ व्यवस्था को समय रहते ही सुधारना होगा। ये ऐसी गंभीर चुनौतियाँ हमारे समक्ष उपस्थित हैं जिनसे निपटने के लिए जनता का सार्थक सहयोग अपेक्षित है। प्रधानमंत्री जी ने जनता से जो संयम बरतने की अपील की है उसके मूल में भी उनकी यही चिंता है। पश्चिम एशियाई संकट के चलते आज आज हमारी अर्थ वयवस्था बड़े बदलावों की मांग कर रही है।
प्रधानमंत्री ने सादगी और संयम की बात करके हमें फिर सादा जीवन उच्च विचार की भारतीय संस्कृति की ओर लौटने का संकेत दिया है। हमारी प्राचीन गुरुकुल की परंपरा हमें सादगी और संयम ही सिखाती थी। यही कारण था कि पिता दशरथ के आदेश का पालन करने के लिए प्रभु श्रीराम समस्त राजसी सुख सुविधा का त्याग करके वन गमन के लिए खुशी खुशी तैयार हो जाते हैं। अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करके सादगी से रहना हमें किसी भी कठिन से कठिन परिस्थितियों से जूझने की शक्ति देता है, हमारी सामर्थ्य को बढ़ाता है। आज हम जिस दौर में हैं उसमें पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव है जिसके चलते हमारे युवा एक नितांत सतही और दिखावे वाला जीवन जीने को बाध्य हैं। अच्छा यह होगा कि हम जल्दी ही अपनी पुरानी सादगी और गरिमा पूर्ण जीवन शैली की तरफ लौटें। यही वह मूल्यवान समय है जब हम अपनी आधुनिक जीवन शैली में परिवर्तन लाकर अपने को स्वस्थ, सुखी और संतुष्ट कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की अपील के निहितार्थ भी वस्तुतः यही हैं जिन्हें समझना आज की जरूरत भी है और जरूरी भी है।
भारी नुकसान के चलते निरंतर गिरती अर्थ व्यवस्था को सुधारना ही होगा और इसके लिए सरकार के साथ प्रत्येक नागरिक का भी दायित्व है कि वह अपनी भागीदारी समझे। ऐसे कठिन समय में जब आर्थिक मार हर घर, हर व्यक्ति तक पहुँच गई हो, गाड़ियां खड़े होने के कगार पर हों किसी भी सरकार के लिए बहुत आसान रास्ता था इस आर्थिक बोझ को जनता के ऊपर डालकर अलग हो जाना। लेकिन हमारी संवेदनशील सरकार ने न केवल जनता को राहत दी बल्कि अपनी नीतिगत कुशलता से जनता के सिर पर एक ऐसा छत्र तान दिया जिससे आम आदमी का जीवन अस्त व्यस्त होने से बच गया। (कुमकुम शर्मा-हिफी फीचर)








